Home परिचय ठा. रुमाल सिंह

ठा. रुमाल सिंह

प्रदर्शनी संस्थापक महान स्वतन्त्रता सेनानी स्व श्री ठा. रुमाल सिंह का संक्षिप्त जीवन परिचय:

महान स्वतन्त्रता सैनानी स्व ठाकुर रुमाल सिंह का जन्म 3 मई 1920 को मेरठ जनपद के कस्बा मवाना के मौहल्ला हीरालाल में जंमीदार दलपत सिंह के घर पर हुआ था। बाल्यकाल में ही आपके माता-पिता ने देश भक्ति की भावना कूट-कूट कर भर दी थी। मात्र 18 वर्ष की उम्र में ठाकुर रुमाल सिंह विद्यापन के दौरान ही स्वतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़ें। व्यक्तिगत सत्याग्रह के समय मात्र 21 वर्ष की उम्र में 19 मार्च 1941 को आपको अंग्रेज पुलिस ने जेल भेज दिया। उस समय आप मवाना नगर काग्रेंस कमेटी के प्रधान मंत्री थे। 15 अप्रैल 1941 को अंग्रेजी सरकार ने चार माह की सजा व 25 रुपये का अर्थ दण्ड लगाया। 14 अगस्त 1941 को आप रिहा हो गये तथा लगातार स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लेते रहें।

सन्‌ 1942 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी द्वारा छेडे गये ''भारत छोड़ो आन्दोलन'' में कूद पड़े। 6 अगस्त 1942 को यह आन्दोलन शुरु होना था, लेकिन अंग्रेज पुलिस ने इस आन्दोलन से पूर्व ही मवाना के तमाम बड़े कांग्रेसी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था फिर कुछ नेता भूमिगत हो गये। जिसके चलते इस आन्दोलन की कमान नगर कांग्रेस कमैटी के प्रधानमन्त्री होने के नाते ठाकुर रुमाल सिंह के हाथों में आ गयी। 9 अगस्त सन्‌ 1942 को ''अंग्रेजो भारत छोड़ो आन्दोलन'' के पहले दिन ठा रुमाल सिंह के नेतृत्व मे छात्रों ने एक विशाल जुलूस निकाला। जुलूस नगर के विभिन्न बाजारों से होता हुआ जब टाउन हाल के मैदान में पहुंचा तो पुलिस आ गयी जिनकी छात्रों से झडप हो गयी। इसी बीच तत्कालीन थानाध्यक्ष ने अपनी रिवाल्वर से फायर किया, जो रसोईघर की टीन में जाकर लगा तथा पुलिस ने निहत्थे छात्रों पर बर्बर लाठी चार्ज किया जिससे छात्रों मे भगदड  मच गयी।  भगदड  में मैदान के चारों ओर लगे तारों में उलझ कर काफी छात्र जख्मी हो गये पुलिस से बदला लेने के लिये छात्रों ने 10 अगस्त को पुनः जुलूस निकाला। जुलूस जब थाने के सामने पहुंचा तो पुलिस ने थाने का मुखय द्वार बन्द कर लिया, लेकिन पुलिस से छात्रों की भिडंत न होने के कारण 16 अगस्त 1942 को पुनः एक जुलूस नगर में निकालने का निर्णय लिया गया।

16 अगस्त 1942 को ठा. रुमाल सिंह के नेतृत्व में तहसील क्षेत्र के लगभग बीस हजार लोगों की भीड़ ए. एस. इन्टर कॉलिज के मैदान में एकत्र हो गयी। अंग्रेज पुलिस ने भारी भीड  को देखते हुये सहायक पुलिस अधिक्षक ग्लैन को हथियार बंद सिपाहियों के साथ मवाना में बुला लिया। भीड  को देखकर अंग्रेज पुलिस के होश उड  गये तथा अंग्रेज पुलिस अधिक्षक ने गोली चला दी जो ग्राम मुबारिक पुर निवासी नवयुवक चन्द्रभान को लगी जो मौके पर ही शहीद हो गया। इसमें अनेक लोग घायल हो गये तथा रुमाल सिंह बाल-बाल बच गये। इस कांड को भारतवर्ष के इतिहास में मवाना गोली कांड  के नाम से जाना जाता है।

मवाना गोली कांड़ में अंग्रेज पुलिस ने दस सितम्बर 1942 को रुमाल सिंह को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। सन्‌ 1943 में एक जून को अंग्रेज जज ने उन्हें चार वर्ष की कड़ी सजा सुनायी। उन्हें जेल में बेडियां डालकर तनहाई कोठरी में चार मास तक रखा गया। जेल में श्री सिंह व उनके साथी कमल सिंह का जेल अधिकारियों से झगडा हुआ जिसमें इन दोनों को 35 दिन तक पुनः बेडियों में डालकर फांसी घर में बंद कर दिया गया। सन्‌ 1947 में देश के आजाद होने के बाद आप पुलिस की नौकरी में शामिल हो गये तथा सेवानिवृत्त होने के बाद में स्वतन्त्रता संग्राम सैनानी परिषद के नाम से एक संस्था की नींव डाली तथा तहसील रोड मवाना में नगर पालिका परिषद कार्यालय के पास में शहीद चन्द्रभान द्वार का निर्माण कराया। इसके बाद सन्‌ 1982 में आपने शहीद चन्द्रभान स्मारक समिति की नींव डाली तथा सन्‌ 1988 में तहसील रोड पर लगने वाली शहीद चन्द्रभान प्रदर्शनी के मुख्य संस्थापक रहे तथा 14 अक्टूबर 1994 को इस र्निभक, निडर, ईमानदार, राष्ट्रभक्त, महान स्वतन्त्रता सैनानी का निधन हो गया।